
कट्टरपंथियों के विरोध के बाद पीछे हटी मरियम सरकार
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मरियम नवाज सरकार ने लाहौर की सड़कों, चौकों और इलाकों के पुराने नाम बहाल करने का फैसला फिलहाल टाल दिया है। जिन नामों को बहाल करने की तैयारी थी, उनमें कई हिंदू और सिख दौर के ऐतिहासिक नाम शामिल थे। सोशल मीडिया और कट्टरपंथी समूहों के विरोध के बाद सरकार ने यह कदम पीछे खींच लिया।

BREAKING: धार्मिक मुद्दा बनते ही प्रशासन सतर्क
कुछ कट्टरपंथी संगठनों और सोशल मीडिया व्लॉगर्स ने इस फैसले को “हिंदू और सिख पहचान वापस लाने” की कोशिश बताते हुए इसका विरोध शुरू कर दिया। बढ़ते विवाद को देखते हुए प्रशासन ने फिलहाल अंतिम निर्णय रोक दिया। लाहौर के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन (रिटायर्ड) मोहम्मद अली एजाज ने पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ से कहा कि अभी इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।
नवाज शरीफ और मरियम नवाज की बैठक में पास हुआ था प्रस्ताव
16 मार्च को लाहौर हेरिटेज एरियाज रिवाइवल (LHAR) की बैठक में शहर के पुराने प्री-पार्टिशन नाम बहाल करने का प्रस्ताव मंजूर किया गया था। बैठक की अध्यक्षता पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने की थी, जबकि पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज भी इसमें मौजूद थीं। इस योजना का मकसद लाहौर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को फिर से सामने लाना था।
मरियम कैबिनेट ने भी दी थी मंजूरी
मई महीने में मरियम नवाज कैबिनेट ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी थी। यह पूरा प्रोजेक्ट लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल (LAHR) के तहत चलाया जा रहा था। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, यह कई अरब पाकिस्तानी रुपए का बड़ा प्रोजेक्ट है।

नवाज शरीफ बोले- इतिहास से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए
बैठक के दौरान नवाज शरीफ ने कहा था कि पाकिस्तान को यूरोपीय देशों से सीख लेनी चाहिए, जहां ऐतिहासिक नामों और विरासत के साथ छेड़छाड़ नहीं की जाती। वहीं, मरियम नवाज ने कहा कि लाहौर का इतिहास ही उसकी असली पहचान है और पुराने नाम व इमारतें उसकी सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा हैं।
विवाद बढ़ने के डर से टला फैसला
PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार को डर था कि इस मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो सकता है। इसी वजह से प्रशासन ने पुराने नाम बहाल करने का फैसला फिलहाल टाल दिया। विरोध बढ़ने के बाद LHAR ने इतिहासकारों, शहरी योजनाकारों, आर्किटेक्ट्स और विशेषज्ञों की बैठक भी बुलाई।
विशेषज्ञों ने कहा- बचाई जाए लाहौर की पुरानी पहचान
सरकारी बयान के अनुसार, बैठक में शामिल ज्यादातर विशेषज्ञों ने माना कि लाहौर की ऐतिहासिक पहचान बहुमूल्य विरासत है और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना जरूरी है। कई इतिहासकार और विशेषज्ञ पुराने नामों को बहाल करने के पक्ष में नजर आए।
पार्टिशन के बाद बदले गए थे कई इलाकों के नाम
1947 में पाकिस्तान बनने के बाद लाहौर समेत कई इलाकों के नाम बदल दिए गए थे। हालांकि, आज भी शहर में कई पुराने हिंदू और ब्रिटिश दौर के नाम आम बोलचाल और लोगों की यादों में मौजूद हैं।

इतिहासकार का दावा- लाहौर ने नहीं छोड़ी अपनी पुरानी पहचान
कराची के इतिहासकार याकूब खान बंगश ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि 1947 के बाद लाहौर में वैसा वैचारिक बदलाव नहीं हुआ जैसा कराची जैसे शहरों में देखने को मिला। उनके मुताबिक, लाहौर में आने वाले ज्यादातर शरणार्थी कामकाजी तबके से थे, जिन्होंने शहर की पुरानी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को अपनाए रखा। इसी वजह से शहर का इतिहास आज भी लोगों की यादों में जिंदा है।
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दानिश अतीक पत्रकारिता के क्षेत्र में पिछले 9 सालों से हैं. इस समय वह इनसाइड न्यूज़ 24x7 में बतौर न्यूज़ डिर्टेक्टर और रिपोर्टर का काम कर रहे हैं. इससे पहले दानिश अतीक फोटोप्लेयर न्यूज़ में न्यूज डेस्क पर काम कर चुके हैं. उन्हें राजनीति, क्राइम और खेल पर लिखना बेहद पसंद है. दानिश मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ के रहने वाले हैं, इन्होंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई लखनऊ यूनिवर्सिटी से की है.
