लखनऊ : सुप्रीम कोर्ट ने सहारा शहर की लीज रद कर के उसका कब्जा लेने के मामले में राज्य सरकार और लखनऊ नगर निगम को नोटिस जारी करके उनसे जवाब तलब किया है। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई को करने को कहा है।

लखनऊ में स्थित सहारा शहर की जमीन को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में एक नया मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सहारा शहर की लीज रद्द करने और जमीन का कब्जा वापस लेने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार तथा लखनऊ नगर निगम को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई को निर्धारित की है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जायमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मेसर्स सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए 29 मई को पारित किया। इस मामले पर प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी विशेष नजर बनी हुई है, क्योंकि सहारा शहर की भूमि को लेकर राज्य सरकार भविष्य की महत्वपूर्ण योजनाओं पर विचार कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीठ ने राज्य सरकार, लखनऊ नगर निगम, नगर आयुक्त और नगर निगम के प्रभारी अधिकारी (संपत्ति) को नोटिस जारी करने का आदेश दिया। अदालत में उपस्थित विपक्षी पक्ष के अधिवक्ता ने नोटिस स्वीकार कर लिया, जिसके बाद कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को 31 जुलाई तक अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राज्य सरकार सहारा शहर की जमीन का कब्जा वापस लेने के बाद वहां नई विधानसभा भवन के निर्माण की संभावनाओं पर विचार कर रही है। ऐसे में इस जमीन के स्वामित्व और उपयोग को लेकर अदालत का अंतिम फैसला भविष्य की सरकारी योजनाओं को प्रभावित कर सकता है।
सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन ने अपनी एसएलपी के माध्यम से इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के 22 अप्रैल के आदेश को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने सहारा की उस याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया था, जिसमें नगर निगम द्वारा लीज रद्द करने और कब्जा लेने के आदेशों को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट का कहना था कि चूंकि यह मामला सहारा-सेबी विवाद से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस पर विचार करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अपने हाथ बंधे होने की बात कहते हुए याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद सहारा ने राहत के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
दरअसल, लखनऊ नगर निगम ने 8 सितंबर 2025 को जारी आदेश के माध्यम से सहारा को 22 अक्टूबर 1994 को दी गई भूमि की लीज को समाप्त कर दिया था। इसके बाद 11 सितंबर 2025 को एक अन्य आदेश जारी कर संबंधित जमीन को खाली कराने के निर्देश भी दिए गए थे। सहारा का तर्क है कि इसी भूमि से जुड़े एक मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) मामले में 2 सितंबर 2017 को उसके पक्ष में फैसला आ चुका था, जिसे नगर निगम ने नजरअंदाज किया। कंपनी का कहना है कि वह लीज की अवधि बढ़ाने के लिए आवश्यक शुल्क जमा करने को तैयार थी, लेकिन इसके बावजूद निगम ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए पट्टा निरस्त कर दिया। अब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई से यह तय होगा कि नगर निगम की कार्रवाई वैधानिक थी या सहारा के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। इस फैसले का असर न केवल सहारा समूह बल्कि राज्य सरकार की भविष्य की विकास योजनाओं पर भी पड़ सकता है।
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दानिश अतीक पत्रकारिता के क्षेत्र में पिछले 9 सालों से हैं. इस समय वह इनसाइड न्यूज़ 24x7 में बतौर न्यूज़ डिर्टेक्टर और रिपोर्टर का काम कर रहे हैं. इससे पहले दानिश अतीक फोटोप्लेयर न्यूज़ में न्यूज डेस्क पर काम कर चुके हैं. उन्हें राजनीति, क्राइम और खेल पर लिखना बेहद पसंद है. दानिश मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ के रहने वाले हैं, इन्होंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई लखनऊ यूनिवर्सिटी से की है.
