“CEO नहीं, ‘प्रधान राम सेवक’ चाहिए” : राम मंदिर ट्रस्ट की नियुक्ति प्रक्रिया पर स्वामी करपात्री का बड़ा बयान

अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति प्रक्रिया के बीच संत समाज से एक बड़ा और चर्चित बयान सामने आया है। स्वामी करपात्री जी ने एक निजी समाचार चैनल के कार्यक्रम में कहा कि भगवान श्रीराम के मंदिर में “CEO” जैसा प्रशासनिक पदनाम उचित नहीं है। उनका कहना था कि श्रीराम के ऊपर कोई प्रशासक नहीं हो सकता, इसलिए इस पद का नाम बदलकर “प्रधान राम सेवक” रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि राम मंदिर केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, जहां सेवा की भावना सर्वोपरि होनी चाहिए। ऐसे में प्रशासनिक और कॉर्पोरेट संस्कृति से जुड़े पदनाम मंदिर की गरिमा और परंपराओं के अनुरूप नहीं माने जा सकते। स्वामी करपात्री ने कहा कि मंदिर की व्यवस्था सेवा, समर्पण और भक्ति के भाव से संचालित होनी चाहिए, न कि प्रशासनिक अधिकारों और पदों के आधार पर।

स्वामी करपात्री के इस बयान के बाद राम मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक ढांचे को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मंदिर में कार्य करने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को भगवान श्रीराम का सेवक माने और उसी भावना के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभाए। उनका मानना है कि “प्रधान राम सेवक” जैसा पदनाम भारतीय धार्मिक परंपरा और सनातन संस्कृति के अधिक निकट है तथा इससे श्रद्धालुओं के बीच सकारात्मक संदेश जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर जैसे पवित्र स्थानों पर कॉर्पोरेट शब्दावली का प्रयोग करने से बचना चाहिए। संत समाज के कई वर्गों में उनके इस विचार को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कुछ संतों ने उनके सुझाव का समर्थन करते हुए इसे भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों के अनुरूप बताया है, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि प्रशासनिक व्यवस्था के लिए पदनाम से अधिक महत्वपूर्ण कार्यप्रणाली और पारदर्शिता होती है।
गौरतलब है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा राम मंदिर में CEO की नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है और इस पद के लिए देशभर से हजारों आवेदन प्राप्त हो चुके हैं। चयन प्रक्रिया को लेकर ट्रस्ट आवश्यक औपचारिकताओं में जुटा हुआ है। इसी बीच स्वामी करपात्री के बयान ने इस नियुक्ति प्रक्रिया को नई दिशा में चर्चा का विषय बना दिया है। अब यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि धार्मिक परंपराओं, सेवा भावना और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर भी विमर्श शुरू हो गया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रस्ट इस सुझाव पर कोई विचार करता है या नहीं। हालांकि, अभी तक ट्रस्ट की ओर से स्वामी करपात्री के बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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दानिश अतीक पत्रकारिता के क्षेत्र में पिछले 9 सालों से हैं. इस समय वह इनसाइड न्यूज़ 24x7 में बतौर न्यूज़ डिर्टेक्टर और रिपोर्टर का काम कर रहे हैं. इससे पहले दानिश अतीक फोटोप्लेयर न्यूज़ में न्यूज डेस्क पर काम कर चुके हैं. उन्हें राजनीति, क्राइम और खेल पर लिखना बेहद पसंद है. दानिश मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ के रहने वाले हैं, इन्होंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई लखनऊ यूनिवर्सिटी से की है.
