हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अगर इसके बाद भी मेयर ने शपथ नहीं दिलाई तो जिलाधिकारी या नगर आयुक्त उनका काम संभालेंगे. वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज से ललित किशोर तिवारी को पार्षद पद पर निर्वाचित घोषित किया गया था.

हाईकोर्ट के आदेश से नगर निगम में मचा हड़कंप
राजधानी लखनऊ से एक बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक खबर सामने आई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने लखनऊ की मेयर सुषमा खर्कवाल के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उनके प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारों को फ्रीज करने का आदेश दिया है। कोर्ट का यह फैसला नगर निगम और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। मामला वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज से निर्वाचित पार्षद को शपथ न दिलाए जाने से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि यदि इसके बाद भी पार्षद को शपथ नहीं दिलाई गई तो मेयर के अधिकार जिलाधिकारी या नगर आयुक्त संभालेंगे।
पार्षद को शपथ न दिलाने पर हुई कार्रवाई
यह पूरा विवाद वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज से जुड़ा हुआ है। चुनाव न्यायाधिकरण ने 19 दिसंबर 2025 को पार्षद प्रदीप कुमार शुक्ला का निर्वाचन निरस्त कर दिया था। इसके बाद सत्र अदालत ने ललित किशोर तिवारी को उस वार्ड का निर्वाचित पार्षद घोषित किया। अदालत के इस फैसले के बावजूद करीब पांच महीने तक उन्हें पार्षद पद की शपथ नहीं दिलाई गई। इसी देरी को गंभीर मानते हुए ललित किशोर तिवारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम प्रशासन और मेयर के रवैये पर नाराजगी जाहिर की।
जस्टिस आलोक माथुर और रिजवी की बेंच ने दिया आदेश
मामले की सुनवाई जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने की। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब तक निर्वाचित घोषित पार्षद ललित किशोर तिवारी को विधिवत शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक मेयर सुषमा खर्कवाल के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार सीज रहेंगे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में निर्वाचित प्रतिनिधि को अधिकारों से वंचित रखना संविधान की भावना के खिलाफ है। कोर्ट ने इस मामले को गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना है।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत
जानकारी के अनुसार मेयर पक्ष ने इस मामले में राहत पाने के लिए हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट का भी रुख किया था, लेकिन उन्हें किसी भी स्तर पर राहत नहीं मिली। इसके बावजूद कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया। अदालत ने इस रवैये को न्यायिक आदेशों की अवहेलना माना। कोर्ट ने पहले भी लखनऊ की मेयर, जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से तलब किया था और जवाब मांगा था कि आखिर निर्वाचित पार्षद को अब तक शपथ क्यों नहीं दिलाई गई।
डीएम या नगर आयुक्त संभाल सकते हैं जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि यदि अब भी आदेश का पालन नहीं हुआ तो लखनऊ नगर निगम के प्रशासनिक और वित्तीय कार्यों की जिम्मेदारी जिलाधिकारी या नगर आयुक्त संभालेंगे। इस आदेश के बाद नगर निगम प्रशासन में हलचल तेज हो गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला स्थानीय निकायों के लिए एक बड़ा संदेश है कि अदालत के आदेशों की अनदेखी किसी भी हालत में स्वीकार नहीं की जाएगी। वहीं विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लेकर मेयर और भाजपा पर निशाना साध रहे हैं।
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दानिश अतीक पत्रकारिता के क्षेत्र में पिछले 9 सालों से हैं. इस समय वह इनसाइड न्यूज़ 24x7 में बतौर न्यूज़ डिर्टेक्टर और रिपोर्टर का काम कर रहे हैं. इससे पहले दानिश अतीक फोटोप्लेयर न्यूज़ में न्यूज डेस्क पर काम कर चुके हैं. उन्हें राजनीति, क्राइम और खेल पर लिखना बेहद पसंद है. दानिश मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ के रहने वाले हैं, इन्होंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई लखनऊ यूनिवर्सिटी से की है.
