
लखनऊ: भारत के अलग-अलग रूपों को अपने कैमरे में कैद करने वाले देश के प्रख्यात फोटोग्राफर रघु राय का आज सुबह एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया। वह 83 साल के थे। उनका अंतिम संस्कार रविवार शाम चार बजे लोधी श्मशान में किया गया। रघु राय के बेटे एवं फोटोग्राफर नितिन राय ने इनसाइड न्यूज 24×7 को बताया कि उनके पिताजी को दो साल पहले प्रोस्टेट कैंसर हुआ था, लेकिन बाद में उन्हें राहत मिलने लगी थी। फिर कैंसर पेट तक फैल गया, जो ठीक हो गया था।
नितिन राय ने आगे बताया कि हाल ही में कैंसर रघु राय के मस्तिष्क तक पहुंच गया था और उन्हें उम्र संबंधी अन्य तकलीफें भी होने लगी थीं। रघु राय के परिवार में उनकी पत्नी गुरमीत, बेटे नितिन और तीन बेटियां लगन, अवनि और पूर्वाई हैं। भोपाल गैस त्रासदी जैसी ऐतिहासिक घटना को रघु राय ने अपने कैमरे के जरिए कैद किया था। उन्होंने पीड़ितों की, जो तस्वीरें क्लिक कीं उसने पूरी दुनिया का ध्यान हादसे की भयावहता पर खींचा था।
रघु राय के बारे में जानिए
- उनका जन्म 1942 में आज के पाकिस्तान में हुआ था।
- फोटोग्राफी का सफर 1960 के दशक में शुरू हुआ।
- उनके काम की प्रदर्शनियां दुनिया के कई बड़े शहरों में आयोजित की गईं।
- उन्होंने राजनीति से लेकर रोजमर्रा की जिंदगी तक सबकुछ कैमरे में कैद किया।
- उन्होंने 18 से ज्यादा किताबें प्रकाशित कीं और ‘टाइम’, ‘लाइफ’ और ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसे प्रकाशनों में अपना योगदान दिया।
- मशहूर फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसन ने खुद उन्हें ‘मैग्नम फोटोज’ में शामिल होने के लिए नॉमिनेट किया, जो किसी भी भारतीय के लिए एक दुर्लभ सम्मान था।
रघु राय के वो काम, जिन्हें देश करेगा याद
- उनकी तस्वीरों में भावनाएं, गहराई और सच्चाई झलकती थी।
- भारत सरकार की ओर से ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ दिया गया।
- 1972 में बांग्लादेश युद्ध की कवरेज के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
- वो अपनी तस्वीरों से ऐसी कहानियां बयां करते थे, जिन्हें शब्दों में कहना मुमकिन नहीं था।
- इंदिरा गांधी के पोर्ट्रेट से लेकर मदर टेरेसा के साथ बिताए पलों तक उनकी फोटोग्राफी दस्तावेज बन गई।
- भोपाल गैस त्रासदी पर उनकी कवरेज उनके सबसे दमदार कामों में से एक मानी जाती है, जिसने पीड़ितों की तकलीफों की ओर दुनिया का ध्यान खींचा।
फ़ोटोग्राफ़ी की दुनिया में रघु राय ने अपना काम इस खूबी से किया है कि वे इस दुनिया के कल्ट फ़िगर माने जाते हैं. फ़ोटोग्राफ़ी की दुनिया में उनका जलवा ऐसा रहा कि बढ़ती उम्र के बावजूद भी वे किसी युवा पेशेवर से ज़्यादा व्यस्त रहे.

प्रधानमंत्री ने सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर श्री रघु राय के निधन पर शोक व्यक्त किया
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर रघु राय के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है और उन्हें कला का एक ऐसा पर्याय बताया है जिन्होंने अपने लेंस के माध्यम से भारत की जीवंतता को अमर बना दिया। श्री मोदी ने कहा कि श्री रघु राय का कार्य गहन संवेदनशीलता, गहराई और विविधता से परिपूर्ण था, जिसने भारत के जनजीवन के विभिन्न पहलुओं को संजोया और उन्हें लोगों के करीब लाया। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि फोटोग्राफी और संस्कृति की दुनिया में उनका योगदान अद्वितीय है और उनका निधन कला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

दुनिया भर की समाचार-पत्रिकाओं से फ़ोटो खींचे जाने के अनुरोध के बीच अपने आख़िरी दिनों में भी वे फ़ोटोग्राफ़ी के इतिहास को संजोने में जुटे थे.
कुछ साल पहले एक बातचीत में रघु राय ने अपनी ज़िंदगी की तस्वीर खोल कर दिखाई थी.
उन्होंने बताया, ”हमारे समय में लोग बचपन में कहां कुछ तय कर पाते थे. घर का माहौल कुछ ऐसा था कि पढ़ता था और आस-पड़ोस के बच्चों के साथ खेल धूप लेता था. शाम के बाद घर से बाहर रहने की इजाज़त नहीं होती.”
पिता को याद करते हुए एक क्षण के लिए वो ठिठके और फिर बोले, ”पिताजी का अनुशासन ऐसा था कि वे जो चाहते, वही मैं करता. तब ऐसा ही चलन था. वे चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूं, तो मैं 22 साल की उम्र में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुका था. इसके बाद फिरोजपुर के जाट रेजिमेंट में ड्राइंग इंस्ट्रक्टर के तौर पर एक साल तक काम भी किया लेकिन काम में मन नहीं रम रहा था. लेकिन किसी दूसरे काम में भी दिलचस्पी नहीं पैदा हो रही थी.”
हालांकि तब तक रघु राय के बड़े भाई एस पॉल फोटोग्राफ़ी की दुनिया में स्थापित हो चुके थे. संयोग से 1966 में रघु उनके पास दिल्ली आए.
वे तब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में चीफ़ फोटोग्राफ़र हुआ करते थे. कुछ ऐसा संयोग हुआ कि उनके एक साथी अपने गांव जा रहे थे. रघु राय ने भाई से जिद ठान ली कि उन्हें उनके साथ जाने दिया जाए. रघु राय ने भाई की इजाज़त तो ली है, उनका कैमरा भी ले लिया. सोचा गांव में कुछ तस्वीरें खींच लेंगें.
रघु राय ने उन दिनों को याद करते हुए बताया था, ”बात ये हुई कि रास्ते में एक गधा दिखा, मैंने उसकी तस्वीर लेनी चाहिए. पर वह भागने लगा. मैं उसके पीछे भागने लगा. यह खेल तब तक चला जब तक गधा थक कर रुक नहीं गया. तब जाकर मैंने उसकी तस्वीर खींच ली. बाद में बड़े भाई साहब ने उसे देखा, और उसका प्रिंट तैयार करके उसे विदेश के कुछ अखबारों के लिए भेज दिया.”
इस तस्वीर ने उनकी ज़िंदगी में चमत्कार किया. पहली ही तस्वीर ‘लंदन टाइम्स’ में आधे पन्ने पर छप गई. तब उन्हें इसके इतने पैसे मिले कि महीने भर का वेतन बराबर हो गया. रघु को लगा कि वो भी ये कर सकते हैं. बस इसी भरोसे ने उन्हें कैमरे के पीछे ला खड़ा किया.
उस दौर को याद करते हुए उन्होंने बीबीसी से कहा था, ”आप इसे संयोग, किस्मत या फिर जो चाहें कह लें, भाई साहब फ़ोटोग़्राफर नहीं होते, मेरी पहली तस्वीर ‘लंदन टाइम्स’ में नहीं छपती, तो शायद मैं कभी फ़ोटोग्राफ़र नहीं बनता.”
रघु राय ने माना था कि उन्हें नौकरी मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई थी. भाई साहब थे ही, फिर पहली तस्वीर लंदन टाइम्स में छपने के बाद से ही उनमें भी फ़ोटोग्राफी के प्रति पैशन आ गया.
उन्होंने बताया था, “भाई साब का रुतबा था, उनकी पहचान की बदौलत ही मुझे हिंदुस्तान टाइम्स में नौकरी भी मिली. उन्होंने मुझे पहला कैमरा ख़रीद कर दिया. शुरुआती सालों में उनके साथ ही रहा. जिस रघु राय को दुनिया जानती है, वो रघु राय नहीं बन पाता अगर भाई साब नहीं होते.”
रघु राय अपने बड़े भाई की स्कूटर लेकर दिल्ली की सडक़ों पर निकल पड़ते. घंटों इधर-उधर के चक्कर काटते, फ़ोटो के मौके तलाशते. रघु राय को 1966 में ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में नौकरी मिल गई. लेकिन वहां वो ज़्यादा दिन तक नहीं टिके. क्योंकि तब ‘द स्टेट्समैन’ की काफ़ी प्रतिष्ठा हुआ करती थी, 1967 में वो वहां पहुंच गए.
अपने करियर के शुरुआती दिनों के बारे में उन्होंने बताया था, “फ़ोटोग्राफ़ी के मेरे शुरुआती दिनों में एक तरफ़ तो पॉल साब थे, तो दूसरी तरफ़ किशोर पारीख जैसे जीनियस भी थे, जिनके साथ मैंने हिंदुस्तान टाइम्स में अपने करियर की शुरुआत की थी. दो जीनियस के बीच दबने का ख़तरा था, सैंडविच बन जाने का डर भी था. लेकिन मेरी दोनों ओर इतने जालिम लोग थे कि उनके सामने हमेशा बेहतरीन करते रहने की प्रेरणा मिलती थी.”
रघु राय अपनी जिंदगी में स्टेट्समैन की भूमिका को अहमियत देते रहे.
उनके मुताबिक़, ”सच पूछिए तो इसी अख़बार ने मुझे नामचीन फ़ोटोग्राफ़र बनाया. वहां एक समाचार संपादक थे-आर.एन. शर्मा. परंपरागत पत्रकार थे, लेकिन आदमी बहुत भले थे. वे मेरी तस्वीरों को ध्यान से पढ़ते थे. तस्वीरों को देख तो सब लेते हैं लेकिन उसे पढ़ना सबके बस की बात नहीं होती.”
रघु राय की ऐतिहासिक फोटो देखें

”संयोग ऐसा था कि वे मेरी तस्वीरों को पढ़कर उम्मीद से ज़्यादा जगह देने लगे थे. इससे मेरा भरोसा पक्का होता गया. मेहनत भी बढ़ गई. लेकिन मैं तस्वीरों को ज़्यादा से ज़्यादा से बेहतर बनाने की कोशिश जरूर करता. वे कहते दो कॉलम की फ़ोटो बनाना, लेकिन मैं फ़ोटो बनाता चार कॉलम की. तस्वीर को देखने के बाद वे उसकी जगह निकाल ही लेते. तो मेरे बनने में उनका बड़ा योगदान रहा.”
इस अख़बार में उनके काम की ऐसी धमक हुई कि वो चार साल के अंदर ही वर्ल्ड फोटोग्राफ़ी के लीजेंड हेनरी कार्टियर ब्रेस्सन की नज़र उन पर पड़ी. पेरिस में एक प्रदर्शनी में उनकी तस्वीर को देख कर हेनरी ने उन्हें मैग्नम फोटोज से जोड़ लिया. दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारों के कॉपरेटिव समूह से जुड़ने वाले भारत के पहले फोटोग्राफ़र बने और आख़िरी समय तक सबसे सेलिब्रेटेड फोटोग्राफ़र भी रहे.
लेकिन ‘द स्टेट्समैन’ में काम करने के समय की एक घटना का जिक्र वे नहीं भूले, “बात जेपी आंदोलन के समय की है. बिहार में आंदोलन चरम पर था. मैं जेपी के साथ बिहार घूम रहा था. आंदोलन के दौरान उनपर लाठी चार्ज हुआ था लेकिन तत्कालीन गृह मंत्री ने इसका खंडन कर दिया. अगले ही दिन ‘स्टे्टसमैन’ के पहले पन्ने पर लाठीचार्ज की तस्वीर देखकर गृहमंत्री को संसद में माफी मांगनी पड़ी.”

रघु राय की तस्वीरों के विषय हमेशा आम आदमी और उसके हाव भाव और शहरों की रौनक और गलियों की हलचल आदि रहे जबकि फोटोग्राफ़र नदी, तालाब, पर्वत जैसी चीजों को कैमरे में कैद करना पसंद करते हैं, इस पसंद की कोई वजह?
इस सवाल को सुनते ही उनकी आंखों में एक चमक आई. तुरंत बोले, ”देखिए मेरी परवरिश उस समाज में हुई जहां, आम इंसानों की कद्र करना सिखाया गया. आम इंसानों के भावों से हमारा रोज का वास्ता पड़ता है. आप यकीन करें या न करें, ये आम लोग ही हैं जिनके हालात आजादी के इतने सालों के बाद भी जस के तस है, ऐसे लोग मुझे आकर्षित करते रहे हैं.”

उन्होंने कहा, ”भारत के आम लोग, उनके रहन-सहन और जीवनशैली की दुनिया भर में चर्चा होती है, मैं भी उन्हें सम्मान से देखता हूं. कई बार कोशिश करता हूं कि मेरे चित्रों से सत्ता में बैठे लोगों का ध्यान आम लोगों की समस्याओं पर जाए. वैसे सच यही है कि मैं आम लोगों की तस्वीरें उतारकर कहीं ज़्यादा सुकून पाता हूं.”
कई बार उनकी तस्वीरों की सिरीज़ को देखते हुए लगता है कि वे महज फोटोग्राफ़र नहीं थे, बल्कि बीते साठ सालों के इतिहास को विजुअली मेमोरी के तौर पर डॉक्यूमेंट करने वाले कस्टोडियन भी रहे.
इंदिरा गांधी और मदर टेरेसा से अपनी नज़दीकियों के बारे में बात करते हुए उन्होंंने बताया था, ”इन हस्तियों से नजदीकियां काम के सिलसिले में बनीं. जब मैं स्टेट्समैन में काम कर रहा था तब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री हुआ करती थीं. सच पूछिए तो मैंने उन जैसी राजनीतिक हस्ती दूसरी नहीं देखी. उनके आलोचक चाहे जो कहें लेकिन वो एक कमिटेड नेता थीं.”
एक दौर ऐसा भी था कि रघु राय भारतीय मीडिया के सेलिब्रेटी फोटोग्राफ़र संपादक थे, लेकिन वे हमेशा फ़िल्मों और क्रिकेट से एक दूरी पर दिखाई दिए. जबकि मीडिया का काम इन दोनों टॉपिक के बिना नहीं पूरा नहीं हो सकता.
इस दोनों के असर पर उन्होंने कहा था, ”देखिए ऐसा नहीं है कि मुझे फ़िल्में पसंद नहीं आतीं लेकिन अपनी तबीयत उस माध्यम में काम करने की कभी नहीं हुई. दरअसल मायानगरी का तामझाम, चमक-दमक मुझे प्रभावित नहीं कर पाया या कहें कि मैं उस चमक-दमक से दूर ही रहना चाहता था.”
”जहां तक क्रिकेट की बात है तो मैं आपको बता दूं कि बतौर खेल यह भी मुझे पसंद है और मंसूर अली खां पटौदी और कपिल देव बतौर क्रिकेटर मुझे काफी पसंद रहे. लेकिन असली मुश्किल यह है कि यह महज खेल भर नहीं रह गया. इसमें इतना पैसा आ गया है कि खेल का रोमांच कहीं पीछे छूट गया है.”
क्रिकेट के कॉर्पोरेटीकरण पर उन्हें दुख था. वो बोले,” यह अब कार्पोरेट कारोबार में तब्दील हो चुका है. अपने खिलाड़ियों का भी ध्यान खेल से ज़्यादा पैसे बनाने पर होता गया. इस एक खेल के फेर में दूसरे खेलों की क्या गत हो गई यह किसी से छुपी नहीं है. कई बार तो लगता है कि क्रिकेट खेल कम राष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचार ज़्यादा होता जा रहा है.”
रघु राय फोटोग्राफ़र नहीं होते तो क्या होते?
इस सवाल का जवाब तो उनके पास तैयार था, ”इसके लिए मुझे इतनी ज़्यादा सोच विचार नहीं करनी होती. देखिए मुझे फ़ोटोग्राफ़ी से जितनी मोहब्बत है, उतना ही लगाव मुझे बागवानी से है. अगर मैं फ़ोटोग्राफ़र नहीं होता तो पक्का माली होता.”
वो बोले, ”मैं फोटोग्राफ़र होने के बाद भी शनिवार-रविवार को कोई काम नहीं करता हूं . अपने फार्म हाउस पर दिन बिताता हूं. मैंने अपने फार्म हाउस पर हर तरह के फूल पौधे लगा रखे हैं. दुनिया भर से उसे इकट्ठा करता रहा हूं. उसमें भी काफी मजा आता है और लगता है कि प्रकृति की छांव में हूं.”
About the Reporter
दानिश अतीक पत्रकारिता के क्षेत्र में पिछले 9 सालों से हैं. इस समय वह इनसाइड न्यूज़ 24x7 में बतौर न्यूज़ डिर्टेक्टर और रिपोर्टर का काम कर रहे हैं. इससे पहले दानिश अतीक फोटोप्लेयर न्यूज़ में न्यूज डेस्क पर काम कर चुके हैं. उन्हें राजनीति, क्राइम और खेल पर लिखना बेहद पसंद है. दानिश मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ के रहने वाले हैं, इन्होंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई लखनऊ यूनिवर्सिटी से की है.
